चहुँ दिशा में फैली यह खबर है,
किसान नत्था, मरने को तैयार है,
न पूछता कोई, न बूझता कोई,
विपदा वह कौनसी, चाहता जिसे दूर है ।
भाव से विहीन, कर्म में प्रवीण,
अजब है मीडिया की भी बीन,
उजले तन वालों के मन में,
यह कैसा दीमक है लगा,
देखो विडंबना, मृत्यु भी,
है बनी तमाशा यहाँ,
हर कृपा का था हकदार जो,
कर्म कर, भी था लाचार जो,
कृष्ण की इस धरती पर,
दुर्योधन सा भी न मिला मान उसको,
इतिहास कर्ण का,
फिर दोहरा गया,
इस कुंठित समाज की भेंट,
ऎक जीवन, फिर चढा़,
वह लाल मृदा का,
तो है माटी हो गया,
पर इस हृदय की चेतना,
का भाव है मिट रहा,
न अब पूछिऍ यह लहू,
किस ऒर है बह रहा,
पाताल, अंबर और धरती भी,
न जानते इसका पता ।
Sunday, November 28, 2010
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