Wednesday, November 29, 2006

लालाजी के देहांत पर

संदर्भ : लाला लाजपत राय की मृत्यु और क्रान्तिकारियों के सीनों में भड़कती चिंगारियाँ

भूले नहीं भूलता वो मॅजर,
वो लाठी, वो चिरता सर,

लाल थे सीने सभी,
झेलते अंग्रेजी गोली,
करते भी क्या वो,
पसंद नही था नाम-गुलामी,

खून अब उबाल पर था,
शायद था अब लाल हुआ,
धधकी साँस ,धधकी मन,
प्रत-यौवन था कह रहा,

कब तक मुँह दर्पण से छिपाऎँ,
क्यों न ये बेडियाँ तोड़ गिराऎँ,
कायरों से कब तक गिड़गिड़ाऎँ,
कलम से अब काम नहीं चलता,
बाँध ले लंगोट और बंदूक उठा,
चोरी नहीं है यह, नही डाका,
आत्म-सम्मान की अब करनी है रक्षा।

-देवेश कुमार सिंह

Tuesday, November 28, 2006

कवियारा

क्यों स्वयं के बारे में बतलाऊँ मैं?

धूमिल इस दृश्य से,क्यों यह परदा उठाऊँ मै?
क्यों शालीनता की यह,जर्जर दीवार गिराऊँ मैं?
नयनों से बहते इस नीर को,क्योंकर तुम्हें दिखलाऊँ मैं?
व्कत भावनाओं को कर,क्यों ग्लानि से भर जाऊँ मैं?

-देवेश कुमार सिंह




ले चल मॉजी मुझे दूर किनारों से,
ले चल मुझे बीच मॅजधारों में,
आज मुझे इन लहरों का आलिंगन करना है,
वेग इनका कुछ अपने दामन में भरना है,

जो उल्हास है इनके पावन कणों में,
उससे भिगो इस मन को तृप्त आज करना है,
दम चाहे उखङ जाये, चाहे जान भी जाये,
मॉजी रे, आज मुझे इन लाहरों पर चढ़ना है ।

-देवेश कुमार सिंह