संदर्भ : लाला लाजपत राय की मृत्यु और क्रान्तिकारियों के सीनों में भड़कती चिंगारियाँ
भूले नहीं भूलता वो मॅजर,
वो लाठी, वो चिरता सर,
लाल थे सीने सभी,
झेलते अंग्रेजी गोली,
करते भी क्या वो,
पसंद नही था नाम-गुलामी,
खून अब उबाल पर था,
शायद था अब लाल हुआ,
धधकी साँस ,धधकी मन,
प्रत-यौवन था कह रहा,
कब तक मुँह दर्पण से छिपाऎँ,
क्यों न ये बेडियाँ तोड़ गिराऎँ,
कायरों से कब तक गिड़गिड़ाऎँ,
कलम से अब काम नहीं चलता,
बाँध ले लंगोट और बंदूक उठा,
चोरी नहीं है यह, नही डाका,
आत्म-सम्मान की अब करनी है रक्षा।
-देवेश कुमार सिंह
Wednesday, November 29, 2006
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1 comment:
a good effort against a lost genre.
I would say that vir-raas is not that prominent is english.
you have influences of Atal jee and Makhan lal.
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