Friday, February 08, 2008

गुम हुए शब्द सारे,
चुप है जु़बान,
काली हुई चादर बर्फ की,
काला है आसमाँ,

मिटते रंगों में,
डूबने लगी है ये रंगीन शाम,
धुआँ भी उठा,
छाने लगा है ये कुहरा घना,

फीकी हुई चाँदनी,
चमेली को भी नीँद आने लगी,
अलसाई अलसी भी,
दीप की भी लौ डगमगाने लगी,

फिर भी खड़ा हूँ,
बाट जोहता, उस मुसाफिर की,
संग मेरे दो पग जो,
इस राह पर चला था कभी......

-- देवेश कुमार सिंह
(dated : 22/11/2k7 , 11:30 pm)
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