Saturday, November 17, 2007

कुछ फिर रिक्त हो जाने को है,
कुछ फिर तृप्त हो जाने को है,
व्याकुल हुआ फिर हृदय आज है,

उदासिनता है मानो जम गई,
लौ में वक्त की थम गई,
चित्र कुछ उभरे नये हैं,
भर्ान्तियाँ मिट जाने को हैं,

दूर वह किनारा रह गया,
धार ने भी, लिया मोड़ नया,
मुड़ गईं हवाऎं भी,
मँजिल भी खो जाने को है,

ये दुःख विरह के,
क्या सुनाऊँ कह के,
दास्ताँ यह खुद ही,
नैनों से आज बह जाने को है,

टूटे कदम कुछ यों,
बूँद तले कच्चे घट पड़े हों,
फतह भाग पर ना मिली,
लकीरें भी आज मिट जाने को हैं,

- देवेश कुमार


न आजाद गगन है,
न आजाद ज़मीं है,

थके कदम,
सासें भी गर्म हुई हैं,

तपती रेत,
बादल का नामो-निशाँ नहीं है,

साया काल का,
भी मँडराता यहीं है,

पार जाना मुश्किल नहीं है,
बस अब रखना यकीँ यही है,

बटोर हिम्मत बढ़ना,
यही तो राही, जिन्दगी है।।

- देवेश कुमार

Sunday, March 25, 2007

जवाब - कुछ कमी

कमियो का जो युँ हिसाब करोगे
जो युँ दूरियों को अहसास में भरोगे
तो बिखरते इन कंधों को कैसे कसोगे
कैसे रेत पर चिन्ह वो बनाओगे
जिनके निसानों को समंदर भी मिटा ना पाएगा

कुछ कमी

बस कुछ कमी सी रहती है,
जब इन बाहों में कोइ बाहें ना हों
बस कुछ कमी सी रहती है,
जब इन आँखों में कोइ आँखें ना हों
बस कुछ कमी सी रहती है,
जब इन होठों पे कोइ होठ ना हों
बस कुछ कमी सी रहती है,
जब इन हाथों में कोइ हाथ ना हों
बस कुछ कमी सी रहती है,
जब दिल किसी के लिये बेकरार ना हो
बस कुछ कमी सी रहती है,
जब किसी से प्यार ना हो

- प्रेम

Thursday, January 18, 2007

मत रो , तू मुस्कुरा

मत रो , तू मुस्कुरा
यह जिन्दगी ले रही है तेरा इम्तिहान

दिन वह भी आऎगा,
तू जीत का परचम लहराऎगा,
राहें मुश्किल जरूर है,
पर मत बन तू अधीरा ,

मत रो , तू मुस्कुरा..........

विश्वास रख स्वयं पर,
मत मन की उड़ानों के पर कतर,
तेरे माथे का तिलक भी,
बनेगा कभी तो यह अबीरा,

मत रो , तू मुस्कुरा..........

रात अंधियाली काली आज है,
पर कल पर चला किसका राज है,
कर्म कर, मत सोच क्या मिला,
कल कदमों तले होगी तेरे यह धरा,

मत रो , तू मुस्कुरा..........

-देवेश कुमार सिंह

Monday, January 08, 2007

ये मैं नहीं कह रहा,
कहता मेरा स्वत्व है
खोजता है एक अधुरा सा
कहीं छुपा जो तत्व है
सन्घर्ष मुश्किल हो ना जाये..
सच कहीं यूँ खो ना जाये
इसलिये थामे मशाल मैं
निकल आया हूं आगे
हो सके तो तुम भी आओ
मेरे हाथ से हाथ मिलाओ

- प्रेम
स्थात्वि का वरादान मिले,
दृढ़ प्रतिज्ञ तू बने,
संयम स्व-मन का बना रहे,
ख्याति तेरी अंबर-सम तने,

विलीन होती इस बेला में,
शेष कुछ लोलुप बचा नहीं,
त्याग दे मोह इस क्रम का,
और ले नई प्रतिज्ञा यहीं,

-देवेश कुमार सिंह