Thursday, July 17, 2008

जिन्दगी ने कर दिया दिवाना,
पर भगवन, है यह जन्नत कहाँ,
बतलाना मुझे,

जख्म आदमी के,पनपाता है आदमी,
रस्म क्या है यह,
जरा समझाना मुझे,

ठग रहा खुद को वो, समझा नहीं आज तक जो,
अंत इस रिवाज का है कहाँ,
दिखलाना मुझे,

नाम तेरा, काम तेरा, फल गहूँ मैं आप को,
है यह धर्म कैसा,
सिखाना मुझे,


देह यह त्याग दूँ, तू कहे तो भाग दूँ,
पर निज अभिमान को, बलि किसी की तार दूँ,
है कैसा सम्मान यह,
जताना मुझे,

--देवेश कुमार सिंह
(July 4, 1:48 AM)

Saturday, April 05, 2008

जीवन ये बितायें भी तो किस तरह?
हर साँस में बसी याद तुम्हारी,
दर्द ही दर्द है हर अहसास में,
आँख में है हर वक्त नमीं हमारी,

वादे जो तुमने कभी किए ही नहीं,
ना जाने क्यों, निभाने उन्हें हम चल दिये,
जो राह तुमने कभी दिखाई ही नहीं,
ना जाने क्यों, नग्न पग हम उस ओर बढ़ दिये,

तन्हा भी तन्हाई यूँ तो कट जाती,
जो सामने तुम न आते इस तरह,
वक्त-बेक्त होता है दीदार तुम्हारा,
तुमको भुलाऐँ भी तो किस तरह,

जीवन ये बितायें भी तो किस तरह?

--- देवेश कुमार सिंह(dated : 5/4/2k8 , 5:52 pm)
यदा कदा ही लिखता हूँ मैं,
जाने किसकी राह तकता हूँ मैं,
ये काया, मन की छाया,
सर्मपित करने को चहकता हूँ मैं,

आद्र नयन कहते हैं कुछ,
इन्हें समझाता हूँ मैं,
तेल था वो जल गाया,
अब खाक बाती जलाता हूँ मैं,

--- देवेश कुमार सिंह
(dated : 6/3/2k8 , 9:20 pm)

Friday, February 08, 2008

गुम हुए शब्द सारे,
चुप है जु़बान,
काली हुई चादर बर्फ की,
काला है आसमाँ,

मिटते रंगों में,
डूबने लगी है ये रंगीन शाम,
धुआँ भी उठा,
छाने लगा है ये कुहरा घना,

फीकी हुई चाँदनी,
चमेली को भी नीँद आने लगी,
अलसाई अलसी भी,
दीप की भी लौ डगमगाने लगी,

फिर भी खड़ा हूँ,
बाट जोहता, उस मुसाफिर की,
संग मेरे दो पग जो,
इस राह पर चला था कभी......

-- देवेश कुमार सिंह
(dated : 22/11/2k7 , 11:30 pm)
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