जिन्दगी ने कर दिया दिवाना,
पर भगवन, है यह जन्नत कहाँ,
बतलाना मुझे,
जख्म आदमी के,पनपाता है आदमी,
रस्म क्या है यह,
जरा समझाना मुझे,
ठग रहा खुद को वो, समझा नहीं आज तक जो,
अंत इस रिवाज का है कहाँ,
दिखलाना मुझे,
नाम तेरा, काम तेरा, फल गहूँ मैं आप को,
है यह धर्म कैसा,
सिखाना मुझे,
देह यह त्याग दूँ, तू कहे तो भाग दूँ,
पर निज अभिमान को, बलि किसी की तार दूँ,
है कैसा सम्मान यह,
जताना मुझे,
--देवेश कुमार सिंह
(July 4, 1:48 AM)
Thursday, July 17, 2008
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