यदा कदा ही लिखता हूँ मैं,
जाने किसकी राह तकता हूँ मैं,
ये काया, मन की छाया,
सर्मपित करने को चहकता हूँ मैं,
आद्र नयन कहते हैं कुछ,
इन्हें समझाता हूँ मैं,
तेल था वो जल गाया,
अब खाक बाती जलाता हूँ मैं,
--- देवेश कुमार सिंह
(dated : 6/3/2k8 , 9:20 pm)
Saturday, April 05, 2008
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