कवियारा
क्यों स्वयं के बारे में बतलाऊँ मैं?
धूमिल इस दृश्य से,क्यों यह परदा उठाऊँ मै?
क्यों शालीनता की यह,जर्जर दीवार गिराऊँ मैं?
नयनों से बहते इस नीर को,क्योंकर तुम्हें दिखलाऊँ मैं?
व्कत भावनाओं को कर,क्यों ग्लानि से भर जाऊँ मैं?
-देवेश कुमार सिंह
ले चल मॉजी मुझे दूर किनारों से,
ले चल मुझे बीच मॅजधारों में,
आज मुझे इन लहरों का आलिंगन करना है,
वेग इनका कुछ अपने दामन में भरना है,
जो उल्हास है इनके पावन कणों में,
उससे भिगो इस मन को तृप्त आज करना है,
दम चाहे उखङ जाये, चाहे जान भी जाये,
मॉजी रे, आज मुझे इन लाहरों पर चढ़ना है ।
-देवेश कुमार सिंह
Tuesday, November 28, 2006
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1 comment:
since this is my first comment.
I would like to thank you for writing blog in hindi, i cannot do the same for many reasons one of them is lazyness and other is my pursuit of perfection for my mother tongue.
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