Saturday, November 17, 2007

कुछ फिर रिक्त हो जाने को है,
कुछ फिर तृप्त हो जाने को है,
व्याकुल हुआ फिर हृदय आज है,

उदासिनता है मानो जम गई,
लौ में वक्त की थम गई,
चित्र कुछ उभरे नये हैं,
भर्ान्तियाँ मिट जाने को हैं,

दूर वह किनारा रह गया,
धार ने भी, लिया मोड़ नया,
मुड़ गईं हवाऎं भी,
मँजिल भी खो जाने को है,

ये दुःख विरह के,
क्या सुनाऊँ कह के,
दास्ताँ यह खुद ही,
नैनों से आज बह जाने को है,

टूटे कदम कुछ यों,
बूँद तले कच्चे घट पड़े हों,
फतह भाग पर ना मिली,
लकीरें भी आज मिट जाने को हैं,

- देवेश कुमार


न आजाद गगन है,
न आजाद ज़मीं है,

थके कदम,
सासें भी गर्म हुई हैं,

तपती रेत,
बादल का नामो-निशाँ नहीं है,

साया काल का,
भी मँडराता यहीं है,

पार जाना मुश्किल नहीं है,
बस अब रखना यकीँ यही है,

बटोर हिम्मत बढ़ना,
यही तो राही, जिन्दगी है।।

- देवेश कुमार

1 comment:

!Teq-uila Del Zapata said...

awesome!!! both are lovely ones.
nice flow touched with "marmikta"
second poem reminds me of atalji's poem during emergency.